अपने किशोर से मानसिक स्वास्थ्य के बारे में कैसे बात करें
किशोरों से मानसिक स्वास्थ्य पर खुली और सहायक बातचीत करने के लिए माता-पिता की व्यावहारिक गाइड।
- सही समय और माहौल चुनें. जब आपका बच्चा शांत हो और आपके पास पर्याप्त समय हो, तब बातचीत शुरू करें। घर में एकांत की जगह चुनें जहाँ कोई व्यवधान न हो। टीवी बंद करें और फोन एक तरफ रख दें। कार में सफर के दौरान या रात में सोने से पहले भी अच्छा समय हो सकता है। बच्चे को लगना चाहिए कि आप पूरी तरह उसके लिए उपलब्ध हैं।
- बातचीत की शुरुआत करें. सीधे 'तुम्हारा मानसिक स्वास्थ्य कैसा है' जैसे सवाल न पूछें। इसके बजाय दैनिक गतिविधियों से शुरुआत करें जैसे 'स्कूल में आजकल कैसा लग रहा है?' या 'दोस्तों के साथ कैसा चल रहा है?'। अपने अनुभव भी साझा करें जैसे 'जब मैं तुम्हारी उम्र का था तो मुझे भी कभी-कभी परेशानी होती थी'। इससे बच्चा समझेगा कि ऐसी भावनाएँ सामान्य हैं।
- ध्यान से सुनें और समझें. जब आपका बच्चा बात करे तो उसे बीच में न टोकें। उसकी आँखों में देखें और दिखाएँ कि आप सुन रहे हैं। 'हम्म', 'समझ गया' जैसे शब्दों का इस्तेमाल करें। उसकी भावनाओं को स्वीकार करें भले ही आपको लगे कि बात छोटी है। 'मैं समझ सकता हूँ यह तुम्हारे लिए मुश्किल है' जैसे शब्द कहें। तुरंत सलाह देने की कोशिश न करें, पहले उसे पूरी बात कहने दें।
- भावनाओं को समझने में मदद करें. बच्चों को अपनी भावनाओं को समझने और व्यक्त करने में मदद करें। 'क्या तुम्हें लग रहा है कि तुम दुखी हो, गुस्से में हो, या परेशान हो?' जैसे सवाल पूछें। उन्हें बताएँ कि सभी भावनाएँ सामान्य हैं और इन्हें छुपाने की जरूरत नहीं। यदि वे कहते हैं कि वे 'ठीक' हैं लेकिन आपको लगता है कि वे परेशान हैं, तो धीरे से पूछें 'क्या तुम वाकई ठीक हो या कुछ और चल रहा है?'।
- सहायता और समाधान की बात करें. बच्चे के साथ मिलकर समस्या के समाधान खोजें। पूछें 'तुम्हें क्या लगता है इससे मदद मिल सकती है?' या 'मैं तुम्हारी कैसे मदद कर सकता हूँ?'। तनाव कम करने के तरीके बताएँ जैसे गहरी सांस लेना, टहलना, संगीत सुनना या दोस्तों से बात करना। यदि समस्या गंभीर लगे तो बताएँ कि परामर्शदाता या डॉक्टर से मिलना भी एक अच्छा विकल्प है और इसमें कोई शर्म की बात नहीं।
- नियमित बातचीत बनाए रखें. मानसिक स्वास्थ्य की बात सिर्फ एक बार न करें। इसे नियमित दिनचर्या का हिस्सा बनाएँ। हफ्ते में कम से कम एक बार पूछें कि कैसा महसूस कर रहे हैं। खाना खाते समय या सैर पर जाते समय इस तरह की बातें करें। बच्चे को बताएँ कि वह कभी भी आपके पास आकर अपनी परेशानी बता सकता है। अपने व्यवहार से दिखाएँ कि आप हमेशा उसके साथ हैं।