किशोर की खाने की समस्या में कैसे साथ दें

किशोर बच्चे की खाने की समस्या को समझने और सहयोग करने के लिए माता-पिता के लिए व्यावहारिक गाइड।

  1. चेतावनी के संकेतों को पहचानें. खाने की मात्रा में अचानक कमी या बढ़ोतरी पर ध्यान दें। वजन में तेजी से घटाव या बढ़ाव, खाने के बाद तुरंत बाथरूम जाना, खाना छुपाना, या खाने को लेकर अत्यधिक चिंता करना जैसे संकेत मिलें तो सचेत हो जाएं। मूड में बदलाव, सामाजिक गतिविधियों से बचना, खुद को दर्पण में बार-बार देखना, और कपड़ों का ढीला होना भी महत्वपूर्ण संकेत हैं। अगर आपका बच्चा भोजन के समय बहाने बनाता है या परिवार के साथ खाने से बचता है तो ये भी चिंता की बात है।
  2. सहानुभूति के साथ बात करें. जब आप अपने बच्चे से इस बारे में बात करें तो पहले एक शांत और निजी जगह चुनें। आरोप लगाने वाली भाषा से बचें और 'मैं' के वाक्यों का इस्तेमाल करें जैसे 'मैंने महसूस किया है कि तू परेशान लग रहा है'। उनकी भावनाओं को समझने की कोशिश करें और उन्हें यह एहसास दिलाएं कि आप उनके साथ हैं। सुनने में धैर्य रखें और तुरंत समाधान देने की कोशिश न करें। उन्हें बताएं कि खाने की समस्याएं आम हैं और इनका इलाज संभव है।
  3. घर का माहौल सकारात्मक बनाएं. खाने के वक्त तनावमुक्त माहौल बनाएं और भोजन को लेकर दबाव न डालें। वजन, शरीर के आकार, या कैलोरी के बारे में बात करने से बचें। पूरे परिवार के साथ नियमित भोजन का समय निर्धारित करें। दर्पण या तराजू को आसानी से नजर आने वाली जगह से हटा दें। घर में सभी तरह का पौष्टिक भोजन उपलब्ध रखें और 'अच्छा' या 'बुरा' भोजन का लेबल न लगाएं। बच्चे की अन्य खूबियों और उपलब्धियों की तारीफ करें, सिर्फ दिखावट की नहीं।
  4. पेशेवर मदद लें. जल्द से जल्द किसी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से मिलें जो खाने की समस्याओं में विशेषज्ञता रखता हो। बाल रोग विशेषज्ञ से भी सलाह लें ताकि शारीरिक स्वास्थ्य की जांच हो सके। थेरेपी सेशन में नियमित जाना सुनिश्चित करें और चिकित्सक के दिए गए सुझावों का पालन करें। अगर जरूरत हो तो पोषण विशेषज्ञ की भी मदद लें। कई बार परिवारिक थेरेपी भी फायदेमंद हो सकती है।
  5. लंबे समय तक साथ दें. रिकवरी एक लंबी प्रक्रिया है और इसमें उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। धैर्य रखें और हिम्मत न हारें। बच्चे की छोटी-छोटी प्रगति को भी सराहें लेकिन अत्यधिक ध्यान भोजन पर न दें। अपनी देखभाल भी करना न भूलें - अगर आप स्वस्थ रहेंगे तो ही बेहतर सहयोग कर पाएंगे। सपोर्ट ग्रुप से जुड़ें जहां दूसरे परिवारों से मिल सकें। स्कूल के काउंसलर को भी इस स्थिति के बारे में बताएं ताकि वे भी सहयोग कर सकें।