बच्चों को 'ना' स्वीकार करना कैसे सिखाएं
बच्चों को 'ना' का जवाब सुनना और मानना सिखाने के व्यावहारिक तरीके और सुझाव।
- स्पष्ट और दृढ़ रहें. जब आप 'ना' कहें तो अपनी बात पर अटल रहें। बार-बार अपना फैसला न बदलें क्योंकि इससे बच्चा सीख जाता है कि जिद करने से काम बन जाता है। सरल और स्पष्ट भाषा का इस्तेमाल करें जैसे 'अभी मिठाई नहीं मिलेगी' या 'पार्क में जाने का समय नहीं है'। लंबी व्याख्या देने की जरूरत नहीं है। अपना स्वर शांत लेकिन दृढ़ रखें।
- बच्चे की भावनाओं को समझें. जब बच्चा परेशान हो तो उसकी भावनाओं को स्वीकार करें। कहें 'मैं समझ रहा हूं कि तुम्हें गुस्सा आ रहा है' या 'तुम उदास हो क्योंकि खिलौना नहीं मिला'। इससे बच्चा महसूस करता है कि आप उसकी बात समझते हैं। उसे रोने या निराश होने की अनुमति दें, लेकिन अपने फैसले पर अडिग रहें। बच्चे को बताएं कि गुस्सा होना ठीक है लेकिन चीखना या मारना गलत है।
- वैकल्पिक समाधान सुझाएं. सिर्फ 'ना' न कहें, बल्कि कुछ विकल्प भी दें। जैसे अगर अभी पार्क नहीं जा सकते तो कहें 'अभी पार्क नहीं जा सकते, लेकिन घर में गेंद से खेल सकते हैं'। या 'अभी चॉकलेट नहीं, लेकिन शाम को खाने के बाद मिलेगी'। इससे बच्चा सीखता है कि हमेशा कुछ न कुछ विकल्प होते हैं। छोटे विकल्प दें जो आप पूरे कर सकें।
- 'हां' कहने के मौके भी दें. पूरे दिन सिर्फ 'ना' न कहते रहें। जब संभव हो तो 'हां' भी कहें ताकि बच्चा यह न सोचे कि आप हमेशा मना ही करते हैं। छोटी-छोटी बातों में बच्चे को विकल्प दें जैसे 'लाल टी-शर्ट पहनोगे या नीली?' या 'सेब खाओगे या केला?'। इससे बच्चा महसूस करता है कि उसकी राय भी मायने रखती है और जरूरी मामलों में आपका 'ना' कहना आसानी से स्वीकार कर लेता है।
- अच्छे व्यवहार की तारीफ करें. जब बच्चा बिना जिद के आपकी बात मान ले तो उसकी तारीफ जरूर करें। कहें 'वाह! तुमने बहुत अच्छी तरह से समझा' या 'मुझे खुशी हुई कि तुमने मेरी बात मानी'। इससे बच्चा सीखता है कि अच्छा व्यवहार करने से माता-पिता खुश होते हैं। तारीफ तुरंत करें, देर न करें। छोटे बच्चों को गले लगाएं या हाई-फाइव दें।
- धैर्य रखें और निरंतर अभ्यास करें. यह सीखने में समय लगता है। कुछ दिनों में तुरंत बदलाव की उम्मीद न करें। हर दिन थोड़ा-थोड़ा अभ्यास करते रहें। अगर एक दिन बच्चा बहुत जिद करे तो हार न मानें। अगले दिन फिर से कोशिश करें। अपना गुस्सा काबू में रखें क्योंकि चिल्लाने से बच्चा और भी जिद करता है। याद रखें कि हर बच्चा अलग होता है और सीखने की गति भी अलग होती है।